पल्मोनेरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी) फेफड़ों का बेहद दुर्लभ प्रकार का विकार है, जिसके भारत में 100 से भी कम मामले दर्ज किए गए हैं
नई दिल्ली (अमन इंडिया) । फोर्टिस हॉस्पीटल, शालीमार बाग के डॉक्टरों ने फेफड़ों के अत्यंत दुर्लभ विकार - पल्मोनेरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी), जो कि जीवनघाती भी हो सकता है, से पीड़ित 57-वर्षीय महिला मरीज का सफल इलाज किया है। इस विकार से पीड़ित मरीजों के फेफड़ों में वायु की थैलियों (एयर सैक) में प्रोटीन और वसा जैसा पदार्थ असामान्य रूप से जमा हो जाता है और इसकी वजह से सांस लेने में काफी रुकावट होती है। , डॉ विकास मौर्या, सीनियर डायरेक्टर एवं एचओडी – रेस्पीरेटरी मेडिसिन एंड रेस्पीरेटरी क्रिटिकल केयर, फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने मरीज के फेफड़ों की होल लंग लेवेज (संपूर्ण फेफड़ों की धुलाई) प्रक्रिया कर दोनों फेफड़ों की धुलाई कर उनमें जमा पदार्थों को हटाया। इस जटिल प्रक्रिया के लिए 30 लीटर से अधिक नमकीन पानी का इस्तेमाल किया गया था। दोनों फेफड़ों की इस प्रकार धुलाई के दो दिन बाद ही मरीज को स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई।
उक्त मरीज पहले से डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन से भी ग्रस्त थीं और जब उन्हें अस्पताल लाया गया तो उन्हें सांस लेने में काफी तकलीफ थी, तथा खांसी, बुखार के साथ-साथ ऑक्सीजन लेवल भी गिरकर 83% रह गया था। उनकी प्रति मिनट 5 से 6 लीटर ऑक्सीजन पर निर्भरता थी और वह पिछले करीब एक महीने से बिस्तर तक सिमटकर रह गई थीं, हालांकि उनके गृहनगर बिहार और बाद में कानपुर में भी उनका इलाज चल रहा था। फोर्टिस शालीमार बाग में भर्ती के बाद उनके सीटी स्कैन से पता चला कि इस विकार की वजह से उनके फेफड़ों के ऊतकों (टिश्यू) पर काफी बुरा असर पड़ा था। मरीज की नाजुक हालत और लगातार बिगड़ रही सांसों की स्थिति को देखते हुए, मेडिकल टीम ने तुरंत होल लंग लेवेज का फैसला किया, जो कि पल्मोनेरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी), के उपचार का गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है।
इस प्रक्रिया को, लंग्स के लिए “पावर वॉश” कहा जाता है, और इसमें प्रत्येक फेफड़े की काफी अधिक मात्रा में स्टेराइल फ्लूड से धुलाई की जाती है और यह काम सामान्य एनेस्थीसिया देने के बाद किया जाता है, जबकि दूसरा फेफड़ा इस दौरान सांस लेने की प्रक्रिया को सपोर्ट करता है। मेडिकल टीम ने दो चरणों में इस प्रक्रिया को पूरा किया, और दोनों के बीच एक सप्ताह की दूरी रखी गई थी। पहले चरण में, 11 लीटर से भी अधिक फ्लूड से लंग की धुलाई की गई, जबकि दूसरे चरण में 20 लीटर फ्लूड का इस्तेमाल किया गया। इस तरह, फेफड़ों में जमा हुए प्रोटीन पदार्थों को हटाया गया। पहली धुलाई के बाद ही, मरीज की ऑक्सीजन निर्भरता में काफी कमी आयी थी, और दूसरे सत्र के बाद, वह पूरी तरह से ऑक्सीजन सपोर्ट से मुक्त हो गई थीं और सामान्य ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल को बरकरार रख पायी थीं।
इस मामले की जानकारी देते हुए, डॉ विकास मौर्या, सीनियर डायरेक्टर एवं एचओडी रेस्पीरेटरी मेडिसिन एंड रेस्पीरेटरी क्रिटिकल केयर, फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग ने कहा, “पल्मोनेरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी) बेहद दुर्लभ और काफी फेफड़ों का जीवन-घाती विकार है जिसका निदान और प्रबंधन करना अक्सर काफी मुश्किल होता है। इस कंडीशन के चलते सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी, सीने में बेचैनी और ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाती है, और इलाज नहीं होने पर इसकी वजह से रेस्पीरेटरी फेलियर हो सकता है। पीएपी के उपचार के मामले में लंग लेवेज यानी फेफड़ों की धुलाई को गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है, लेकिन यह बेहद स्पेश्यलाइज़्ड और संसाधन-सघन प्रक्रिया है जिसे विशेषज्ञता, संसाधनों, एनेस्थीसिया सपोर्ट, प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट तथा मल्टीडिसीप्लीनरी तालमेल की आवश्यकता के चलते केवल चुनींदा टर्शियरी केयर सेंटरों में ही किया जाता है। प्रत्येक लंग लेवेज के लिए 5-6 घंटे का समय लग सकता है और यह काफी जोखिमपूर्ण भी होता है, खासतौर से उन मरीजों के मामले में जो ऑक्सीजन सपोर्ट पर निर्भर होते हैं। हमारी रेस्पीरेटरी, एनेस्थीसिया, फिजियोथेरेपी और क्रिटिकल केयर टीमों के बीच तालमेल और सावधानीपूर्वक प्लानिंग, तथा प्रोटोकॉल्स का कड़ाई से पालन करते हुए, हम इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर पाए और मरीज को भी शानदार क्लीनिकल नतीजों का लाभ मिला।
नवीन शर्मा फेसिलिटी डायरेक्टर फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग ने कहा “इन सफल नतीजों ने फोर्टिस हॉस्पीटल शालीमार बाग में उपलब्ध उन्नत रेस्पीरेटरी केयर की क्षमताओं तथा अस्पताल की मल्टीडिसीप्लीनरी टीमों की विशेषज्ञता को दर्शाया है। पल्मोनेरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी) के लिए स्पेश्यलाइज़्ड इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लीनिकल उत्कृष्टता तथा समन्वित देखभाल की जरूरत होती है। इस प्रकार के मामले शीघ्र निदान और समय पर एडवांस उपचार तक पहुंच के महत्व को रेखांकित करते हैं, जिनसे मरीजों को लाभ मिलता है और उनकी लाइफ क्वालिटी भी बेहतर बनती है।