भारत में लीवर स्वास्थ्य का मूक संकट: नए आंकड़ों के अनुसार, जांच और रोकथाम की है अत्यंत आवश्यकता
डॉ. पीयूष विश्वकर्मा कंसल्टेंट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, हेपेटोलॉजी एवं लिवर प्रत्यारोपण (लिवर ट्रांसप्लांट) आरजी हॉस्पिटल्स, दिल्ली
नई दिल्ली (अमन इंडिया) । भारत तेज़ी से बढ़ते लीवर स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है। नए महामारी-संबंधी डेटा से पता चलता है कि फैटी लीवर की बीमारी अब देश भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित कर रही है और पिछले दशक में इसके मामलों की दर तेज़ी से बढ़ी है। हाल ही में हुई वैश्विक और राष्ट्रीय हेल्थ रिसर्च की समीक्षा से मिले इन नतीजों के आधार पर एक्सपर्ट्स जांच और रोकथाम के लिए तुरंत कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।
डॉ. पीयूष ने कहा कि फैटी लीवर बीमारी को अब ज़्यादा सटीक रूप से MASLD (मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लीवर डिज़ीज़) कहा जाता है। इससे भारत की 16% से 32% आबादी के प्रभावित होने का अनुमान है। यह आँकड़ा लगभग 12 करोड़ लोगों के बराबर है।
जब इन आँकड़ों पर और गहराई से अध्ययन किया जाता है तो यह और भी चिंताजनक लगते हैं। 26,000 से ज़्यादा लोगों पर की गई 50 स्टडीज़ के विश्लेषण से पता चला है कि भारत में 38.6% वयस्कों को नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिज़ीज़ (NAFLD) है। डायबिटीज़ या मोटापे से पीड़ित लोगों में यह दर (52.8%) और भी ज़्यादा है।
बच्चे भी इससे प्रभावित हैं। इसी विश्लेषण में पाया गया कि 35.4% बच्चों को फैटी लीवर की बीमारी है, और मोटापे से ग्रस्त बच्चों में यह आँकड़ा बढ़कर 63.4% हो जाता है।
फैटी लीवर की बीमारी किसी को भी हो सकती है, चाहे वे कहीं भी रहते हों या कोई भी काम करते हों। स्टडीज़ से पता चलता है कि भारत के IT सेक्टर में काम करने वाले लोगों को इसका ज़्यादा ख़तरा होता है, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक बैठकर काम करना पड़ता है और उनकी लाइफस्टाइल की आदतें भी अस्वस्थ होती हैं। कर्नाटक और उत्तर भारत में हुई रिसर्च में भी शहरों और गांवों, दोनों जगहों पर इस बीमारी के ज़्यादा मामले पाए गए। डायबिटीज़, पेट के आसपास ज़्यादा चर्बी और इंसुलिन रेजिस्टेंस इसके मुख्य जोखिम फैक्टर हैं।
हालांकि यह समस्या बड़े पैमाने पर फैली हुई है, लेकिन इस साल की शुरुआत में लीवर विशेषज्ञों के एक देशव्यापी सर्वे में बीमारी की पहचान और इलाज के तरीकों में कमियां पाई गईं। इससे पता चलता है कि फैटी लीवर की बीमारी के बढ़ते बोझ के हिसाब से हेल्थकेयर के तौर-तरीके अभी भी विकसित नहीं हो पाए हैं।
फैटी लीवर की बीमारी के बढ़ने के मुख्य कारणों में टाइप 2 डायबिटीज़, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और शारीरिक गतिविधि की कमी शामिल हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह एक मौका भी है, क्योंकि जिन लोगों की इनमें से किसी एक बीमारी के लिए जांच होती है, उनकी दूसरी बीमारियों के लिए भी जांच की जा सकती है। स्वास्थ्य लाइफ़स्टाइल में बदलाव, जैसे कि संतुलित डाइट खाना और नियमित रूप से एक्सरसाइज करना आदि उपाय एक ही समय में कई स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मदद कर सकते हैं।
हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में फैटी लीवर बीमारी का बोझ लगातार बढ़ता जाएगा। इसलिए एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि इस स्थिति को नियंत्रित करने का अवसर तेजी से हाथ से निकल रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए बेहतर डेटा कलेक्शन, जांच के लिए एक समान मानक (स्टैंडर्ड) विकसित करना और ग्रामीण व संसाधन-सीमित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर समुदाय-आधारित स्क्रीनिंग कार्यक्रम चलाना, नीति-निर्माताओं और स्वास्थ्य व्यवस्था की प्रमुख प्राथमिकताएं होनी चाहिए।