- मातृभाषा में इलाज से मरीजों को मिली बेहतर समझ
- डॉक्टरों ने हिंदी के प्रति सम्मान और जागरूकता का दिया संदेश
नोएडा (अमन इंडिया ) । विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर फेलिक्स हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक सराहनीय और प्रेरणादायक पहल करते हुए सभी मरीजों की प्रिस्क्रिप्शन हिंदी भाषा में लिखीं। इस अनोखे प्रयास के माध्यम से चिकित्सकों ने न केवल मरीजों को दवाइयों और इलाज से जुड़ी जानकारी सरल भाषा में समझाई, बल्कि हिंदी के प्रति सम्मान और जागरूकता का संदेश भी दिया।
फेलिक्स हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. डी.के. गुप्ता ने बताया कि मेडिकल पर्ची अक्सर अंग्रेज़ी में लिखी होती है, जिसे गाँवों और सामान्य वर्ग से आने वाले मरीजों को समझने में परेशानी होती है। कई बार भाषा की यह दूरी इलाज में भ्रम और दवाइयों के गलत उपयोग का कारण भी बन जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व हिंदी दिवस के मौके पर यह निर्णय लिया गया कि प्रिस्क्रिप्शन, जांच रिपोर्ट की सलाह और दवा सेवन के निर्देश हिंदी में दिए जाएं, ताकि मरीज और उनके परिजन बिना किसी असमंजस के उपचार प्रक्रिया को समझ सकें। मातृभाषा में संवाद होने से मरीज और डॉक्टर के बीच विश्वास का रिश्ता और मजबूत होता है। जब मरीज अपनी ही भाषा में बीमारी, जांच और दवाइयों के बारे में जानकारी प्राप्त करता है तो वह अधिक सहज महसूस करता है और इलाज के प्रति उसकी भागीदारी भी बढ़ती है। हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भावनाओं और संस्कृति का सेतु है, और चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इसका उपयोग बेहद प्रभावी साबित हो सकता है। तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भले ही अंग्रेजी का व्यापक उपयोग होता हो, लेकिन आमजन से जुड़ाव के लिए हिंदी जैसी सरल और सर्वमान्य भाषा का प्रयोग आवश्यक है। मरीजों और उनके परिजनों ने भी इस पहल की सराहना की। कई मरीजों ने कहा कि पहली बार उन्हें प्रिस्क्रिप्शन पढ़ने और समझने में किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। दवाइयों की मात्रा, समय और सावधानियों को हिंदी में लिखे जाने से उन्हें सही तरीके से पालन करने में सुविधा हुई। इससे न केवल इलाज की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि दवाइयों के गलत उपयोग की संभावना भी कम होगी। भारत भाषाई विविधता का देश है, जहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियां प्रचलन में हैं, लेकिन इन सभी के बीच हिंदी देश की सबसे अधिक बोली जाने वाली और समझी जाने वाली भाषा के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 52.8 करोड़ लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया, जो देश की कुल आबादी का करीब 43.63 प्रतिशत है। वहीं यदि दूसरी और तीसरी भाषा के रूप में हिंदी जानने वालों को भी शामिल कर लिया जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 57 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। हिंदी केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के अधिकांश हिस्सों में संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जा रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे राज्यों में हिंदी मातृभाषा के रूप में प्रमुख है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, असम और दक्षिण भारत के राज्यों में बड़ी संख्या में लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में बोलते और समझते हैं।