इस्लाम तो एक ऐसा दीन है जो बहुत सोच-समझकर पूरे होश-व-हवास के साथ इख़्तियार किया जाए : इरफान अहमद


नई दिल्ली: भाजपा के वरिष्ठ नेता


पूर्व सदस्य हज कमेटी ऑफ इंडिया इरफान अहमद ने एक वक्तव्य मैं कहा कि सदियों से अवाम को दीन के नाम पर मज़हब की जो बाते बताई जा रही है उसके नतीजे में ऐसे नौजवान तैयार हो रहे हैं जो जज़्बात में आकर सड़कों पर उतर आते हैं  और पीठ पर लाठियाँ और सीने पर गोलियाँ खा लेते हैं। फिर क़ौम के फ़ेक लीडर्स उनके घर जा-जाकर घड़ियाली आँसू बहाते हैं और उन्हें शहादत का दर्जा दिलाकर जन्नत पक्की कर देते हैं। उसके बाद चन्दे पर चलने वाली तंज़ीमें और जमाअतें मैदान में आती हैं और मज़लूमों की मदद के नाम पर ख़ूब रसीदें काटती हैं। कुल मिलाकर उम्मत का जो सरमाया, समझदार-व-बाशुऊर लोगों का जो वक़्त और सलाहियतें नौजवानों की अख़लाक़ी तरबियत, उनके नज़रियात की इस्लाह और उनकी तालीम व तरक़्क़ी पर लगना चाहिये था वो सब ऐसे गैप्स को भरने में लग रहा है जिन्हें क़ियामत तक भरा नहीं जा सकता। 


अफ़ीम की ये डोज़ जब ज़रा बढ़ जाती है तो फिर उदयपुर अमरावती जैसे वाक़िआत सामने आते हैं, जिसमें इन्सान नुमा दरिन्दे पूरी इन्सानियत का क़त्ल करके फ़ख़्र जताते हैं और अपने घिनावने अमल से इस बात का सुबूत देते हैं कि वो दो पैरों पर चलने वाले हैवान हैं जिनकी हरकतें देखकर दरिन्दे भी शरमा जाएँ। 


मज़े की बात ये है कि अफ़ीम की डोज़ जब तक हलकी होती है तब तक इस बात का एहसास ही नहीं होता कि कुछ ग़लत हो रहा है, हमारे फ़ेक लीडर्स को ये बात समझ ही में नहीं आ रही है कि नज़रियात की इस्लाह किये बग़ैर और किरदार को मज़बूत बनाए बग़ैर अगर नौजवानों को सड़कों पर उतारकर उनसे अपने हुक़ूक़ की बाज़याबी के लिये नारे लगवाए जाएँगे तो इससे हमेशा नुक़सान ही होगा। इस बात का एहसास उसी वक़्त होता है जब कोई शख़्स उस अफ़ीम की डोज़ थोड़ी सी बढ़ाकर ले लेता है और दरिन्दा बन जाता है। क्योंकि जैसे ही वो डोज़ बढ़ती है तो उदयपुर अमरावती जैसा वाक़िआ सामने आ जाता है और जैसे ही इस तरह का वाक़िआ सामने आता है फ़ौरन पूरी मिल्लत पल्ला झाड़ लेती है। अब हर शख़्स उस वाक़िए की तरदीद करना सवाब का काम समझता है। इस बात पर तवज्जोह फिर भी नहीं दी जाती है कि ये नतीजा तो उसी तालिबानी अफ़ीम का है जिसे हम थोड़ी मिक़्दार में अपनी कौम को पिलाते चले आ रहे हैं। 


अफ़सोस की बात है कि इस्लाम इन्सानियत को जिस बात से निजात दिलाने के लिये आया था, अब उसके माननेवाले उसी अफ़ीम के आदी हो चुके हैं और उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं है।


मेरे अज़ीज़ो भाइयों हक़ीक़त में इस्लाम को समझो। 

इस्लाम कोई मज़हब नहीं है कि कुछ रस्में अदा कर लीं और जज़्बाती नारे लगा दिये और बस हो गया हक़ अदा। इस्लाम तो एक दीन है जो बहुत सोच-समझकर पूरे होश-व-हवास के साथ इख़्तियार किये जाने के लिये है। 

इस्लाम कोई चोला नहीं है कि बस पहन कर निकल गए और जो चाहा करते फिरे, बल्कि इस्लाम एक ज़िम्मेदारी का नाम है, बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का नाम और वो ज़िम्मेदारी है समाज में अमन व सलामती भाईचारा क़ायम करने की।

ज़रा सोचिये क्या इस ज़िम्मेदारी को वो सतही क़िस्म के घटिया लोग उठा सकते हैं जो सिर्फ़ अपने बारे में ही सोचते हों, कोई भी उनको बेवक़ूफ़ बनाकर सड़कों पर उतार लाता हो। जिनके जज़्बात को मामूली सी बात से ठेस पहुँच जाती हो.? जबकि नबी पाक ने तो अपने को गाली देने वालों, अपने शहर से निकाल देने वालों, पत्थर मार-मारकर लहूलुहान कर देने वालों यहाँ तक कि ज़हर देकर मार डालने की साज़िश करने वालों तक को माफ़ कर दिया था। क्यों..? इसलिये कि वो वाक़ई समाज में अमन व सलामती,भाईचारा क़ायम करने की ज़िम्मेदारी को पूरा करना चाहते थे और वो उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में करके दिखा भी दिया। 

यक़ीनन इस तरह की छोटी और सतही बातों से उन्हीं लोगों के जज़्बात को ठेस पहुँच सकती है जो मज़हब की तालिबानी अफ़ीम पीकर घूमते हों। जो लोग इस बात का शुऊर और एहसास रखते हैं कि वो एक ज़िम्मेदार ख़ैरे-उम्मत हैं वो तो बड़ी-बड़ी बातों को भी नज़रअन्दाज़ करके आगे बढ़ जाते हैं। अफ़सोस कि उम्मत में ऐसे दर्दमन्द और फ़िक्रमन्द हज़रात की तादाद आटे में नमक के बराबर भी नज़र नहीं आती है।

इसलिये इस्लाम और मिल्लत का दर्द रखनेवाले तमाम ही बुद्धिजीवी हज़रात से मेरी गुज़ारिश है कि ख़ुद भी उस अफ़ीम से दूर हो जाएँ और मुस्लिम नौजवानों को भी उस अफ़ीम को पिलाना बन्द करें और सीधे-सीधे अपने मुल्क की एकता से जोड़कर उनके नज़रियात को और उनके आमाल व किरदार को दुरुस्त करें। इस काम को अपने-अपने शहरों के लेवल पर पूरी ईमानदारी और ज़िम्मेदारी के साथ जब तक अंजाम नहीं दिया जाएगा तब तक कौम की, मिल्लत की बदहाली से निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आएगा। मेरी अपने देश के नौजवानों से गुज़ारिश है कि अपने मुल्क से मोहब्बत और उसकी तरक्की के एकजुट होकर अपनी राष्ट्रवादी सोच का सबूत देकर अपनी खिदमत अंजाम दे।

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